Thursday, 11 September 2014

poem


              रोशनी की तलाश

मुंदी पलको के ऊपर

रोशनी की परत सी महसुस करती हु

पर पलके खोलने से ड़रती हु,

शायद रोशनी ना हो

भ्रम हो रोशनी का

 

पलके मुंदे कब तक रहु में

आंखे रोशनी को तलाशती है

अंधकार मे घुटता मन मुझे धिक्कारता है

कहता है सामना कर अंधकार का

अंधकार अगर सच है

तो रोशनी भी सच है

दुख को ही क्यु एकमात्र सच मान लिया

सुख भी तो झुट नही है |

 

मुंदी पलके मै साहस भर खोलती हु

अंधकार हि अंधकार है

अंधकार मग्न मेरा मन रोशनी की और उन्मुख हो ऊठता है

ब्याकुल हो पांव मेरे प्रकाश की तलाश मै

निकल पडते है |

मेरा पुरा अस्तित्व आत्मा के प्रकाश से

प्रकाशमान हो उठता है |

 

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