रोशनी की तलाश
मुंदी पलको के ऊपर
रोशनी की परत सी महसुस करती हु
पर पलके खोलने से ड़रती हु,
शायद रोशनी ना हो
भ्रम हो रोशनी का
पलके मुंदे कब तक रहु में
आंखे रोशनी को तलाशती है
अंधकार मे घुटता मन मुझे धिक्कारता है
कहता है सामना कर अंधकार का
अंधकार अगर सच है
तो रोशनी भी सच है
दुख को ही क्यु एकमात्र सच मान लिया
सुख भी तो झुट नही है |
मुंदी पलके मै साहस भर खोलती हु
अंधकार हि अंधकार है
अंधकार मग्न मेरा मन रोशनी की और उन्मुख हो ऊठता है
ब्याकुल हो पांव मेरे प्रकाश की तलाश मै
निकल पडते है |
मेरा पुरा अस्तित्व आत्मा के प्रकाश से
प्रकाशमान हो उठता है |
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