Monday, 15 September 2014

Romantic poem

ल रात अलसायी चांदनी

मेरे कांधे पे सर रख कर सो गई

सहलाते सह्लाते उसके सर को

जाने मै भी कब सो गई

ख्वावो मे मेरे आये थे तारे
हम संग संग झुमे थे, नाचे थे


कब गुज़र गई रात मस्ती में

सूरज के गर्म हाथो ने मेरे माथे को छुया

आधी जागी मै आधी सो रही थी

उस गर्माहट को महसुस करना चाहती थी

महसुस करना चाहती थी अपनत्व के स्पर्श को

जाने अब कब मिले

स्पर्श मे अपनत्व

रिस्तो मे गर्माहट

ख्याबों मे तारे

चांदनी रात और महकते फुल

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