Thursday, 28 August 2014

Ek aur mahasunya


           एक और माहाशुन्य

 मैने पुछा,

प्रथ्वी कहा से आई ?

जबाव मिला,

सुर्य से

मैने पुछा,

सुर्य कहा से आया ?

जबाव आया

उससे भी वडे तारे से

मैने पुछा,वो तारा कहा से आया ?

जबाव मिला,

महाशुन्य मै तैरते......

मैने पुछा,महाशुन्य ! महाशुन्य क्या है?

जबाव मिला

एक विशाल विराट शुन्य

जो कभी खत्म नहि होता

शुन्य,शुन्य,शुन्य अनन्त तक

शुन्य के इसपार भी शुन्य

शुन्य के उसपार भी शुन्य

क्या सचमुच

शुन्य का कोई अन्त नहि ?

 

        दो

जीवन क्या है ?

किसी ने कहा जीवन एक जंग है

किसी ने कहा जीवन खूशी और उमंग है

किसी ने कहा जीवन एक माचिस की तिलि है

जो धीरे धीरे जलकर खत्म हो जाती है

किसी ने कहा जीवन एक पहेली है

जिसे कोई ना सुलझा सका

पर मेरे लिये जीवन है

एक और महाशुन्य

उलझनो का महाशुन्य

एक खत्म होने से पहले हि

दुसरी शुरु हो जाती है

क्या इस महाशुन्य का भी कोई अन्त नही

क्या ये भी अनन्त है ?

  

      तीन

दुखो से घिरी,हालात की मारी

एक बुडिया बेचारी

सडक के किनारे वैटी रो रही थी

और अपने पुर्वजन्मो को दोस दे रही थी

मैने सोचा,

इस जन्म मै अगर भुगतना पडा फल पुर्व जन्म का तो

पुर्व जन्म में किस जन्म का कर्मफल भुगतना पडा था

उससे पुर्वजन्म का

और उस जनम में

उससे भी पुर्व जन्म का

मेरा मन हाहाकार कर उटा

एक और महाशुन्य

जन्म जन्मान्तर का महाशुन्य

क्या इस महाशुन्य का भी कोई अन्त नही ?

क्या ये भी अनन्त है ?

 

 

 

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