Saturday, 23 August 2014

kabita


            नारी बन जीना चाहती हु

देवी,दुर्गा,लक्ष्मी,सरस्वती कह

तुमने मुझको बहलाया है

महान बताकर त्याग करवाया है

नारायन, राम,गोतम,वुद्ध

तुम क्यु नहि बन पाए हो

सदाचार,अहिंसा,न्यायनीती,धर्म

कहा भुल आए हो

मा,बहन,बेटी,भाभी कह

रिस्तो के भंवर मै फ़साया है

स्त्रीधर्म कह मेरी ख्याहिशो का

गला दवाया है |

तुम भी तो बाप,भाई,बेटे हो

फिर मुक्त बिहंग  वन

क्यु आकाश मै चरते हो |

बन कर मा यदि सार्थक है स्त्री जीवन

पित्रित्व से धन्य क्यु नहि पुरुष मन |

देवी,दुर्गा,लक्ष्मी,सरस्वती से पहले

मै एक मानवी हू |

मा,बहन,बेटी,भाभी से पहले

मै एक मानवी हु |

हा नारी हु मै

गर्व है मुझको

नारी बन जीना चाहती हु |

तुम्हारे 'तमगो' के वोझ को

अब मै नहि ढोना चाहती हू |

सब रिस्तो से पहले

मेरा मुझसे नाता है

दिल से निभांऊगी ये रिस्ता

रिस्ता निभाना मुझको आता है |

 

 

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